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कौन हैं Kuldeep Tiwari? लखनऊ से धार आकर सालों तक लड़ी मंदिर की लड़ाई, अब मिली बड़ी जीत

इंदौर.

धार की ऐतिहासिक नगरी से उठी न्याय की गूंज ने आज पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। इंदौर हाई कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला, जिसने सदियों से चले आ रहे संशय के कुहासे को छांटते हुए भोजशाला को स्पष्ट रूप से 'मंदिर' के स्वरूप में परिभाषित कर दिया है, महज एक कानूनी आदेश नहीं बल्कि करोड़ों आस्थावानों के धैर्य की विजय है।

लेकिन इस विजय गाथा के पीछे एक ऐसा नाम है, जिसने कानून की बारीकियों को अपनी साधना बनाया और साक्ष्यों के अंबार से सत्य को बाहर खींच लाया। वह नाम है अधिवक्ता कुलदीप तिवारी।

कौन हैं कुलदीप तिवारी?
कुलदीप तिवारी केवल एक वकील नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के पुनरुद्धार के लिए समर्पित एक 'कानूनी सेनानी' के रूप में उभरे हैं। 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के माध्यम से उन्होंने धर्म और न्याय के बीच एक ऐसा सेतु बनाया है, जिसने इतिहास के धूल धूसरित पन्नों को फिर से पलटने पर मजबूर कर दिया। जब लोग केवल चर्चाओं में व्यस्त थे, तब कुलदीप तिवारी ने अदालतों की चौखट पर दस्तक दी। उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति की है जो दलीलों से ज्यादा, जमीन से जुड़े उन साक्ष्यों पर विश्वास करता है जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। चाहे वह स्तंभों पर उकेरी गई नक्काशी हो या दीवारों पर मौन खड़े संस्कृत के शिलालेख, तिवारी ने हर एक प्रतीक को अदालत के समक्ष एक गवाह के रूप में खड़ा किया।

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क्यों खास थी उनकी याचिका?
कुलदीप तिवारी की याचिका केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि 'ऐतिहासिक न्याय' की एक मार्मिक अपील थी। उन्होंने बहुत ही सुलझे हुए अंदाज में अदालत को यह समझाया कि किसी भी स्थान का धार्मिक स्वरूप उसकी बनावट, उसके मूल चरित्र और वहां सदियों से चली आ रही परंपराओं से तय होता है। उनका तर्क बड़ा सरल था “सत्य कभी पराजित नहीं होता, वह केवल समय के फेर में ओझल हो जाता है।” उन्होंने वैज्ञानिक साक्ष्यों की मांग की, एएसआई (ASI) सर्वे की पैरवी की और तकनीकी तकनीकों जैसे 'ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार' (GPR) के महत्व को समझाया। उनकी इसी समझाइश का नतीजा था कि कोर्ट ने आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से जांच के आदेश दिए, जिसकी रिपोर्ट ने आज इस फैसले की नींव रखी।

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सत्य परेशान हो सकता है किंतु पराजित नहीं।
भोजशाला का निर्णय हमारे ही पक्ष में आएगा – कुलदीप तिवारी
याचिकाकर्ता – भोजशाला प्रकरण #भोजशाला #dhar #indore #Bhojshala #Kuldeep_Tiwari pic.twitter.com/3csscSEVLQ
— Kuldeep Tiwari (@kuldeep1805) May 13, 2026

भोजशाला: राजा भोज की ज्ञान स्थली और वाग्देवी का वास
कुलदीप तिवारी ने अपनी विशेष दलीलों में हमेशा इस बात पर जोर दिया कि धार की यह भोजशाला परमार वंश के राजा भोज द्वारा निर्मित एक अद्वितीय विश्वविद्यालय और माता सरस्वती (वाग्देवी) का पावन मंदिर है। उन्होंने इतिहास के लच्छेदार वृत्तांतों से परे जाकर वास्तुशिल्प के उन प्रमाणों को पेश किया, जो यह चीख-चीख कर कहते हैं कि इस परिसर की आत्मा विशुद्ध रूप से सनातनी है। हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद, जिसमें परिसर को 'मंदिर' माना गया है, कुलदीप तिवारी का नाम इतिहास में उस सूत्रधार के रूप में दर्ज हो गया है जिसने कानूनी अस्त्रों से आस्था के मंदिर की रक्षा की।
न्याय की दहलीज पर एक अटूट संकल्प
कुलदीप तिवारी की यह यात्रा आसान नहीं थी। उन्हें कई मोर्चों पर विरोध और चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उनका 'समझाइश वाला लहजा' और 'कानूनी संयम' कभी नहीं डगमगाया। वे अक्सर कहते हैं कि यह लड़ाई किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि उस सत्य के पक्ष में है जो इतिहास की विसंगतियों के कारण कहीं खो गया था।

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