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योगी सरकार के प्रयासों का असर, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर में आई कमी

योगी सरकार के प्रयासों का असर, पांच साल तक के बच्चों की मृत्यु दर में आई कमी

एसआरएस की ताजा रिपोर्ट में नवजात से लेकर पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मौत के आंकड़ों के सुधार

कंगारू मदर केयर, सीपैप मशीन, मिल्क बैंक व नियमित टीकाकरण बने बड़े सहायक

आयुष्मान आरोग्य मंदिर से लेकर जिला महिला अस्पताल के डाक्टरों व स्टाफ नर्स को प्रशिक्षण करने का भी मिला फायदा

लखनऊ
 योगी सरकार के प्रयासों से प्रदेश में नवजात से पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर में कमी आई है। आंकड़ों में आया यह सुधार हजारों बच्चों के सुरक्षित जीवन, लाखों परिवारों की उम्मीदों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ते विश्वास की कहानी दर्शाता है। साथ ही जन्म के तुरंत बाद होने वाली मृत्यु दर में कमी लाने की चुनौती भी पेश करता है। 

नवजात से लेकर पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई
सेंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) की ताजा रिपोर्ट में नवजात से लेकर पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्यु दर में कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2023 की तुलना में 2024 में नवजात मृत्यु दर (एनएमआर) 26 से 25, शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) 37 से 35 और पांच साल तक उम्र वाले बच्चों की मृत्युदर 42 से 41 रह गई है। यह सर्वे प्रति 1000 बच्चों के हिसाब से किया गया है।   
 
बच्चों की मृत्यु दर में कमी का अगला चरण प्रसव, डिलीवरी पर
उत्तर प्रदेश का उन चुनिंदा राज्यों में शामिल होना, जहाँ बच्चों की मृत्यु दर में सभी आयु वर्गों में कमी आई है, सबके सामूहिक समर्पण, अथक परिश्रम और जमीनी स्तर पर निरंतर किए गए प्रयासों का प्रमाण है। यह रुझान उत्साहजनक हैं तो हमें यह भी याद दिलाते हैं कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में कमी की रफ़्तार अभी भी उम्मीद से धीमी है और जन्म के तुरंत बाद होने वाली मृत्यु दर में खास बदलाव नहीं आया है। इससे साफ़ पता चलता है कि बच्चों की मृत्यु दर में कमी का अगला चरण प्रसव, डिलीवरी और जीवन के पहले 48 घंटों के दौरान दी जाने वाली देखभाल की गुणवत्ता को बेहतर बनाने पर बहुत ज़्यादा निर्भर करेगा।

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स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के अपग्रेड होने से एनएमआर व आईएमआर में कमी आई
किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ शालिनी त्रिपाठी के अनुसार प्रदेश में स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मचारियों के अपग्रेड होने से एनएमआर व आईएमआर में कमी आई है। बीते तीन-चार सालों में आयुष्मान आरोग्य मंदिर से लेकर जिला महिला अस्पताल के डाक्टरों व स्टाफ नर्स को लगातार प्रशिक्षित किया गया है। इसके अलावा नवजात को सांस लेने में दिक्कत होने पर लगाई जाने वाली सीपैप मशीन, कंगारू मदर केयर, मिल्क बैंक, निःशुल्क दवाओं व नियमित टीकाकरण भी शिशुओं की मृत्यु दर कम करने में सहायक साबित हुए हैं। इसके अलावा अस्पतालों में शुरू हुए मदर न्यूबार्न केयर यूनिट (एमएनसीयू), जिसमें प्रसव के बाद मां-बच्चे को एक साथ वार्ड में ठहराया जाता है, से भी बड़ा लाभ हो रहा है। 

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रेफरल प्रोटोकॉल का पालन करने से जन्म के समय पुनर्जीवन प्रक्रियाओं को मिली मजबूती
वीरांगना अवंती बाई महिला अस्पताल की स्टाफ नर्स डेजी रानी ने बताया कि नर्सों को नवजात शिशु की देखभाल पर नियमित रूप से साप्ताहिक वर्चुअल लर्निंग सेशन और समय-समय पर आमने-सामने रिफ्रेशर ट्रेनिंग दी जा रही है। इन ट्रेनिंग से उन्हें नवजात शिशु के खतरे के लक्षणों को पहचानने, समय पर रेफरल प्रोटोकॉल का पालन करने और जन्म के समय पुनर्जीवन प्रक्रियाओं को मजबूत करने में काफी मदद मिली है। वीरांगना अवंती बाई अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ सलमान ने बताया कि बहुत से बच्चों की मौत संक्रमण व अस्वच्छता के कारण भी हो जाती थी। अब अस्पतालों में स्वच्छता व बच्चों को संक्रमण से बचाने के लिए भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है। स्टाफ को प्रशिक्षित किया जाता है कि शिशु के पास आने से पहले डाक्टर, नर्स के हाथ साफ हों, प्रसूता का डिलिवरी क्षेत्र साफ हो, बच्चे को लपेटने वाला कपड़ा साफ हो, बच्चे की नाल काटने वाला उपकरण व नाल में बांधी जाने वाली क्लिप स्वच्छ हो। अस्पतालों में स्वच्छता व संक्रमण कम होना भी शिशु मृत्यु दर कम होने की एक वजह है।

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