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झारखंड में बारिश संकट के बीच डीएसआर तकनीक से धान खेती की सलाह

 रांची
राज्य के कुछेक जिलों को छोड़ दें तो अधिकांश स्थानों पर खेती लायक वर्षापात नहीं हुआ है। जिससे किसानी पर बादल के संकट मंडराने लगे हैं। किसान आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं, उनके बिचड़े खेतों में खराब हो रहे हैं, सिंचाई की समुचित व्यवस्था नहीं रहने के कारण अब उन्हें समय पर धान रोपनी की चिंता सताने लगी है।

आमतौर पर जून और जुलाई मध्य तक धान की रोपनी हो जाती है लेकिन कई स्थानों पर अब तक धान रोपनी तो दूर बिचड़ा तैयार करने लायक वर्षापात नहीं हुआ है। जलवायु परिवर्तन एवं मिट्टी के गिरते स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए धान रोपने के तरीकों में बदलाव समय की मांग हो गई है।

लिहाजा, कृषि विभाग किसानों को वैकल्पिक खेती का निर्देश दे रहा है। इसी कड़ी में सीधी बुआई यानी डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर) तकनीक कारगर साबित हो सकती है। इस तकनीक से धान की सीधी बिजाई होती है, जिससे 30 प्रतिशत पानी, ईंधन और मजदूरी की बचत होगी। इ

स तकनीक से खेत में जुताई की आवश्यकता नहीं पड़ती है, लेबर कास्ट भी कम आता है और किसानों को जेबें ढ़ीली नहीं करनी पड़ती हैं। यही नहीं एक बार बुआई के बाद दोबारा धान का पौधा खेत में नहीं लगाना पड़ता है।

विशेषज्ञ बताते हैं कि धान की सीधी बुआई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के पहले या दूसरे सप्ताह तक कर लेना फायदेमंद होता है।

इस तरह से करें धान की बिजाई:
बीज की मात्रा 10-12 किलो गोंद कतीरा लेपित बीज (प्रासेस्ड सीड) प्रति एकड़ रखें। बिजाई बतर वाले खेतों में गेहूं की तरह मशीन व छींटे प्रणाली से करें। बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर पेंडामेथलीन (स्टाम्प) 200 लीटर पानी मे प्रति एकड़ की दर से स्प्रे भी आवश्यक है।

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पहली सिंचाई देर से व बिजाई के लगभग 15-20 दिनों के बाद करें। उसके बाद सीमित सिंचाई गीला सूखा प्रणाली से 15 दिनों के अंतराल पर कितनी वर्षा हुई उसके आधार पर करें। बता दें कि गोंद कतीरा लेप तकनीक अपनाने से आधी सिंचाई से धान पक जाती है।

नई बीज तकनीक हर्बल हाइड्रोजेल पर आधारित है जिसमें हर्बल हाइड्रोजेल गोंद कतीरा लेपित बीज की बुआई की जाती है। इससे सभी फसलों के पौधों की जड़ें जल्दी सूखती नहीं है। सिंचाई की भी आवश्यकता कम हो जाती है। फसलों में पहली सिंचाई देर से व कम सिंचाई करने के कारण खरपतवार, बीमारियां और कीट प्रकोप भी कम हो जाता है।

नई बीज लेपित तकनीक पानी बचाने व खरपतवार की रोकथाम करने में सक्षम है। बिजाई के तुरंत बाद एक लीटर प्रति एकड़ की दर से पेंडामेथलीन 200 लीटर पानी में छिड़काव करने और पहली सिंचाई देर से करने पर जो खरीफ फसलों में बिजाई के लगभग 15-20 दिनों व रबी फसलों में लगभग 45-50 दिनों के बाद की जाती है।

डीएसआर तकनीक में पानी व ईंधन की होती है बचत:
धान की परंपरागत बिजाई की तुलना में डीएसआर में कम पानी खर्च होता है। साथ ही, ईंधन, समय और खेती की लागत के नजरिए से भी डीएसआर 30 प्रतिशत तक फायदेमंद है। डीएसआर तकनीक पानी के किफायती उपयोग तथा मिट्टी का समुचित ध्यान रखने की प्रेरणा देती है।

डीएसआर में ऐसे ईंधन का उपयोग परंपरागत बिजाई की तुलना में कम होता है। खेत को दो तीन जुताई लगाकर तैयार करें। ड्रिल से 3-5 सेमी गहराई पर बिजाई करें। खेत की तैयारी एवं बिजाई शाम को करें। ड्रिल से 2-3 सेमी गहराई पर बिजाई करें। बिजाई के तुरंत बाद सिंचाई करें। चार पांच दिन बाद फिर सींचे।

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बिजाई के तुरंत बाद व सूखी बिजाई में 0-3 दिन बाद पैंडीमैथालीन 1.3 लीटर प्रति एकड़ स्प्रे करें। बता दें कि सीधी बिजाई में रोपाई वाली धान की बजाए अधिक खरपतवार आते हैं और वे भिन्न भी होते हैं।

दोनों अवस्था में 15 से 25 बाद बिस्पायरीबैक 100 एमएल प्रति एकड़ स्प्रे करें। इस तकनीक से कम खर्च में एक एकड़ खेत में 20 क्विंटल तक धान की उपज होती है।
सीधी बुआई से ये होगा किसानों को लाभ:

    उत्पादन खर्च में कमी
    समय पर बुआई से दो से ढ़ाई हजार रुपये प्रति एकड़ शुद्ध लाभ
    मजदूरों के अभाव की समस्या से छुटकारा
    30 प्रतिशत तक खेतों की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में सहायक
    अगली फसल गेहूं के उत्पादन में बढ़ोतरी
    भूमंडलीय तापमान वृद्धि वाली गैसों के उत्सर्जन में कमी

किसानों ने ये कहा:
    बेड़ो प्रखंड में अधिकांश किसान आज भी वर्षा पर ही खेती निर्भर हैं। जुलाई माह भी बीतने को है लेकिन खेतों में रोपनी की रफ्तार नहीं पकड़ पाई है। प्रखंड के किसानों को श्री विधि व सीधी बिजाई से खेती के लिए जागरूक व जानकारी देने की आवश्यकता है। : पंकज कुजूर, किसान

    इस वर्ष अब तक बेहतर वर्षापात नहीं होने से क्षेत्र के किसान चिंतित हैं। प्रखंड के हजारों एकड़ कृषि योग्य भूमि पर पर्याप्त वर्षा के अभाव में धान की रोपनी नहीं हो सकी है। प्रखंड के किसानों को पारंपरिक खेती श्री विधि व सीधी बिजाई से खेती करने के लिए सरकार द्वारा पहल करके किसानों को जानकारी देनी चाहिए। : विश्वेश्वर मिंज, किसान।

श्री विधि से धान की रोपाई किसानों के लिए वरदान : सुरेश महतो

बेड़ो प्रखंड में बड़े भूभाग में धान की खेती की जाती है। अधिकतर किसान रोपा विधि से धान लगाते हैं। इसकी तुलना में धान की पारंपरिक बुआई जिसे आज श्रीविधि कहा जाता है, से धान लगाना अधिक लाभकारी है। इसमें कम मजदूर, कम पानी, कम बीज और बिना खरपतवार के धान का अच्छा उत्पादन होता है।

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परंपरागत विधि से किसान को प्रति हेक्टेयर 20 से 25 क्विंटल धान की उपज मिलती है। इसकी तुलना में श्री विधि से धान लगाने पर प्रति हेक्टेयर 35 से 50 क्विंटल धान का उत्पादन होता है।

बेड़ो जरिया के डोका टोली गांव निवासी सुरेश महतो ने प्रखंड के किसानों से धान लगाने के लिए श्री विधि अपनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह तकनीक किसानों के लिए वरदान है। धान उत्पादन की श्रीविधि एक ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा पानी के बहुत कम प्रयोग से ही धान की बहुत अच्छी उपज ली जा सकती है।

इसे सघन धान प्रनाली या श्री विधि के नाम से भी जाना जाता है। जहां पारंपरिक तकनीक में धान के पौधों को पानी से लबालब भरे खेतों में उगाया जाता है।

वहीं, श्री विधि तकनीक में पौधों की जड़ों में नमी बरकरार रखना ही पर्याप्त होता है, लेकिन सिंचाई का उचित प्रबंध होना आवश्यक है ताकि जरूरत पड़ने पर फसल की सिंचाई की जा सके। इस विधि में सामान्य तौर से जमीन पर दरारें पड़ने के बाद ही सिंचाई करनी होती है।

 

बेड़ो जरिया के डोका टोली गांव निवासी सुरेश महतो ने प्रखंड के किसानों से धान लगाने के लिए श्री विधि अपनाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि यह तकनीक किसानों के लिए वरदान है। धान उत्पादन की श्रीविधि एक ऐसी तकनीक है जिसके द्वारा पानी के बहुत कम प्रयोग से ही धान की बहुत अच्छी उपज ली जा सकती है।

इसे सघन धान प्रनाल

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