नई दिल्ली
भारत का दोस्त रूस ऐसा कुछ कर रहा है, जिससे पाकिस्तान की टेंशन बढ़ गई है। यूं कहे तो दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को हिलाकर रख दिया है। अफगान तालिबान का एक उच्च-स्तरीय रक्षा प्रतिनिधिमंडल आधिकारिक तौर पर रूस के बड़े रणनीतिक युद्ध अभ्यास 'सेंटर-2026' में शामिल हुआ। यह भागीदारी सिर्फ औपचारिक दौरा नहीं मानी जा रही। विशेषज्ञों का कहना है कि मास्को अब तालिबान को आधुनिक सैन्य कौशल, उन्नत उपकरण और क्षेत्रीय सुरक्षा मंचों तक पहुंच दे रहा है। इस घटनाक्रम से इस्लामाबाद में गहरी चिंता पैदा हो गई है। कई विश्लेषक इसे क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था के लिए संभावित 'गेम चेंजर' बता रहे हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, अब्दुल्ला बिन मसूद कोर के कमांडर मौलवी नसीबुल्लाह 'मदानी' के नेतृत्व में तालिबान प्रतिनिधिमंडल ने इस अभ्यास में हिस्सा लिया। दल ने कठिन युद्ध अभ्यासों को करीब से देखा और कई देशों के वरिष्ठ सैन्य प्रतिनिधियों से विस्तृत बातचीत की। इन देशों में चीन, भारत, उत्तर कोरिया, वियतनाम, कोलंबिया, उज्बेकिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल हैं। एक ही मंच पर इतने अलग-अलग देशों के अधिकारियों से मुलाकात को काबुल की बढ़ती कूटनीतिक और सैन्य पहुंच का संकेत माना जा रहा है
आधुनिक हथियारों और तकनीक का जायजा
'सेंटर-2026' के दौरान तालिबान अधिकारियों ने रूसी सेना की उन्नत तकनीक की बड़ी प्रदर्शनी देखी। प्रतिनिधिमंडल ने कई प्रणालियों का बारीकी से निरीक्षण किया। इनमें बिना पायलट वाले हवाई सिस्टम शामिल थे, यानी निगरानी और हमले वाले नए ड्रोन।
अधिकारियों ने लंबी दूरी की मिसाइल व्यवस्था, सटीक तोपखाना और भारी हथियार मंच भी देखे। इसके अलावा अगली पीढ़ी की रोबोटिक युद्ध तकनीक और स्वचालित रसद प्रणालियों का भी जायजा लिया गया।
जानकारों का मानना है कि इस तरह का संपर्क सिर्फ प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहता। इससे तालिबान को आधुनिक युद्ध के तरीकों, उपकरणों के इस्तेमाल और प्रशिक्षण की जरूरत की बेहतर समझ मिलती है।
प्रशिक्षण और क्षेत्रीय सहयोग पर जोर
बताया जा रहा है कि इस दौरे का एजेंडा हथियार देखने से कहीं आगे था। तालिबान अधिकारियों ने सैन्य शिक्षा बढ़ाने, युद्ध प्रशिक्षण और पड़ोसी देशों के साथ सीमा पार सुरक्षा सहयोग पर औपचारिक बैठकें कीं। बातचीत में यह भी शामिल था कि काबुल अपने लड़ाकों को आधुनिक कौशल कैसे दे और क्षेत्रीय सुरक्षा मंचों में अपनी भूमिका कैसे मजबूत करे।
बता दें कि यह यात्रा काबुल और मास्को के बीच मई 2026 में बड़े सैन्य-तकनीकी सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर के कुछ महीने बाद हुई है। उस समझौते के बाद दोनों पक्षों के बीच संपर्क तेज हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि 'सेंटर-2026' में तालिबान की मौजूदगी उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि बदलने की कोशिश का हिस्सा है। वे खुद को एक अलग-थलग सशस्त्र समूह की बजाय यूरेशियाई रक्षा नेटवर्क के मान्यता प्राप्त सरकारी हिस्सेदार के रूप में पेश करना चाहते हैं।
पाकिस्तान के लिए क्या मायने?
तालिबान, रूस, चीन और भारत जैसे बड़े क्षेत्रीय खिलाड़ियों के बीच बढ़ता तालमेल ऐसे समय में हो रहा है जब काबुल और इस्लामाबाद के रिश्ते पहले से ही बहुत तनावपूर्ण हैं। सीमा पर झड़पें, आतंकी हमलों के आरोप और कूटनीतिक ठहराव ने दोनों पड़ोसियों के बीच अविश्वास बढ़ा दिया है।
रूस तालिबान को क्षेत्रीय सुरक्षा अभ्यासों में तेजी से शामिल कर रहा है। ऐसे में पाकिस्तान अफगानिस्तान को लेकर अपनी रणनीति में खुद को अलग-थलग पा रहा है। इस्लामाबाद लंबे समय से काबुल पर अपनी सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लेने का दबाव बनाता रहा है। लेकिन अब तालिबान को मास्को जैसे बड़े खिलाड़ी से प्रशिक्षण, नेटवर्किंग और आधुनिक सैन्य उपकरणों तक पहुंच मिल रही है।
वहीं, जानकारों का आकलन है कि इससे तालिबान की पारंपरिक युद्ध क्षमता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है। ड्रोन, लंबी दूरी के हथियार, बेहतर प्रशिक्षण और क्षेत्रीय संपर्कों का असर डूरंड रेखा पर शक्ति संतुलन को बदल सकता है। पाकिस्तान के लिए यह संदेश साफ है कि अफगानिस्तान अब सिर्फ उसके प्रभाव क्षेत्र का मुद्दा नहीं रहा। काबुल नई सैन्य और कूटनीतिक साझेदारियां बना रहा है, और इसका सीधा असर सीमा सुरक्षा व क्षेत्रीय समीकरणों पर पड़ सकता है।





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