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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को दी श्रद्धांजलि

भोपाल 

भारतीय जनसंघ के संस्थापक और भारतीय जनता पार्टी के पितृपुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने भोपाल स्थित प्रदेश कार्यालय में उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित की। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कांग्रेस पर जमकर हमला बोला और बाबा साहेब अंबेडकर के अपमान का आरोप भी लगाया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि हम सब डॉ. मुखर्जी का योगदान कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने धारा 370 के खिलाफ आंदोलन किया था। सीएम ने कहा कि डॉ अंबेडकर ने भी धारा 370 के विरोध किया था लेकिन कांग्रेस ने उनपर दबाव बनाया था। उन्होंने कहा कि डॉ अंबेडकर की आत्मा उस दिन भी रोई थी जब जम्मू कश्मीर के लोगों को उनके अधिकार से वंचित किया गया था।

मुख्यमंत्री ने दी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को श्रद्धांजलि, कांग्रेस पर आरोप लगाए

आज भारतीय जनसंघ के संस्थापक और भाजपा के पितृपुरुष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर प्रदेश कार्यालय में स्थित उनकी प्रतिमा पर मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि हम सब डॉ. मुखर्जी का योगदान कभी नहीं भूल सकते। उन्होंने धारा 370 का साहसिक विरोध किया, लेकिन उस समय कांग्रेस ने उनकी बात नही मानी और डॉ अंबेडकर पर भी दबाव बनाया। उन्होंने कहा कि “कांग्रेस ने डॉ. भीमराव अंबेडकर को भी अपमानित किया।जीते जी बाबा साहेब को लोकसभा नहीं जीतने दी गई। उनके निधन के बाद उनके दाह संस्कार में भी कांग्रेस ने रोड़ा अटकाया। जिस विमान से उनका पार्थिव शरीर ले जाया गया, उसके पैसे भी उनसे वसूले गए।” सीएम ने यह भी कहा कि ग्वालियर हाईकोर्ट ने अंबेडकर की मूर्ति को लेकर कमेटी बनाई है और जो निर्णय आएगा, राज्य सरकार उसका पालन करेगी।

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वीडी शर्मा का विपक्ष पर प्रहार

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि “कांग्रेस ने हमेशा झूठ और छल की राजनीति की है। इतिहास गवाह है कि उन्होंने बाबा साहेब का लगातार अपमान किया जबकि भाजपा ने सदैव उनका सम्मान किया है।” उन्होंने कहा कि यही वजह है कि अब कांग्रेस जनाधार खो रही है क्योंकि जनता उसकी सच्चाई समझ चुकी है। बीजेपी ने ऐलान किया है कि 25 जून को वो “काला दिवस” के रूप में मनाएगी, ताकि लोगों को यह याद दिलाया जा सके कि 1975 में इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू कर लोकतंत्र की हत्या की थी।

जनसंघ के संस्थापक डॉ. मुखर्जी को याद ……. 

भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का आज बलिदान दिवस है। डॉ. मुखर्जी भारत की अखंडता और कश्मीर के विलय के दृढ़ समर्थक थे। उन्होंने अनुच्छेद 370 के राष्ट्रघातक प्रावधानों को हटाने के लिए भारतीय जनसंघ के माध्‍यम से हिन्दू महासभा और रामराज्य परिषद के साथ मिलकर सत्याग्रह आरंभ किया था। जिसके चलते डॉ. मुखर्जी 11 मई 1953 को कुख्यात परमिट सिस्टम का उलंघन करके कश्मीर में प्रवेश करते हुए गिरफ्तार कर लिए गए। गिरफ्तारी के दौरान ही विषम परिस्थितियों में 23 जून, 1953 को उनका स्वर्गवास हो गया था। पहले जनसंघ और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी उनके स्‍वर्गवास दिवस पर उन्‍हें हर वर्ष बलिदान दिवस के रूप में याद करती है। इसी तारतम्‍य में मप्र के मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उन्‍हें याद करते हुए अपनी श्रद्धांजलि दी है।

मुख्‍यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोशल मीडिया एक्‍स पर लिखा, “भारतीय जनसंघ के संस्थापक, परम श्रद्धेय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी के बलिदान दिवस पर उनके चरणों में सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।आपने अखंड भारत के जिस संकल्प के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया, वह आज राष्ट्र के नवनिर्माण के साथ साकार हो रहा है। मां भारती की सेवा, लोककल्याण और कमजोर वर्ग के उत्थान की दिशा दिखाते आपके प्रखर विचार, चिंतन, सर्वांगीण विकास हेतु मार्गदर्शन गौरवशाली भारत के निर्माण के आधार हैं।”

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उल्‍लेखनीय है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। संसद में अपने भाषण में उन्होंनें धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। अगस्त 1952 में जम्मू कश्मीर की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि ''या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊंगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा''। डॉ. मुखर्जी अपने संकल्प को पूरा करने के लिये 1953 में बिना परमिट लिये जम्मू-कश्मीर की यात्रा पर निकल पड़े। वहां पहुंचते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 23 जून 1953 को जेल में रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गयी। जेल में उनकी मृत्यु ने देश को हिलाकर रख दिया और परमिट सिस्टम समाप्त हो गया। उन्होंने कश्मीर को लेकर एक नारा दिया था,“नहीं चलेगा एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान”

भारत माता के इस वीर पुत्र का जन्म 6 जुलाई 1901 को एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। इनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बंगाल में एक शिक्षाविद् और बुद्धिजीवी के रूप में प्रसिद्ध थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक होने के पश्चात श्री मुखर्जी 1923 में सेनेट के सदस्य बने। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात, 1924 में उन्होंने कलकत्ता उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में नामांकन कराया। 1926 में उन्होंने इंग्लैंड के लिए प्रस्थान किया जहां लिंकन्स इन से 1927 में बैरिस्टर की परीक्षा उत्तीर्ण की। 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए और विश्व का सबसे युवा कुलपति होने का सम्मान प्राप्त किया। श्री मुखर्जी 1938 तक इस पद को सुशोभित करते रहे। अपने कार्यकाल में उन्होंने अनेक रचनात्मक सुधार किये तथा इस दौरान 'कोर्ट एंड काउंसिल ऑफ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बैंगलोर' तथा इंटर यूनिवर्सिटी बोर्ड के सक्रिय सदस्य भी रहे।

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कांग्रेस प्रत्याशी और कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में उन्हें बंगाल विधान परिषद का सदस्य चुना गया किन्तु कांग्रेस द्वारा विधायिका के बहिष्कार का निर्णय लेने के पश्चात उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। बाद में डॉ. मुखर्जी स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और निर्वाचित हुए।

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें अंतरिम सरकार में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री के रूप में शामिल किया। नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के बीच हुए समझौते के पश्चात 6 अप्रैल 1950 को उन्होंने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर-संघचालक गुरु गोलवलकर से परामर्श लेकर श्री मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को राष्ट्रीय जनसंघ की स्थापना की।

1951-52 के आम चुनावों में राष्ट्रीय जनसंघ के तीन सांसद चुने गए जिनमें एक डॉ. मुखर्जी भी थे। तत्पश्चात उन्होंने संसद के अन्दर 32 लोकसभा और 10 राज्यसभा सांसदों के सहयोग से नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी का गठन किया। एक दक्ष राजनीतिज्ञ, विद्वान और स्पष्टवादी के रूप में वे अपने मित्रों और शत्रुओं द्वारा सामान रूप से सम्मानित थे। एक महान देशभक्त और संसद शिष्ट के रूप में भारत उन्हें सम्मान के साथ याद करता है।

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